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पूरी लंका जल गई लेकिन विभीषण का भवन क्यों नहीं

आज तक अपने रामायण कई बार पढ़ी होगी मगर अपने शायद ही पढ़ा होगा की पूरी लंका जल गई लेकिन विभीषण का भवन नहीं जला, तो आज की चर्चा में हम आपको बताएँगे की क्या वजह थी जिस कारन विभीषण का भवन रहा सुरक्षित.

तो आइये जानते है

साधु अवग्या कर फलु ऐसा। जरइ नगर अनाथ कर जैसा॥
जारा नगरु निमिष एक माहीं। एक बिभीषन कर गृह नाहीं॥
ताकर दूत अनल जेहिं सिरिजा। जरा न सो तेहि कारन गिरिजा॥

विभीषण जैसे साधु के अपमान का यह फल है कि लंका, अनाथ के नगर की तरह जल रही है। हनुमान्‌जी ने एक ही क्षण में सारा नगर जला डाला। एक विभीषण का घर नहीं जलाया॥

भगवान शंकर माता पार्वती से कहते हैं-हे पार्वती! जिन्होंने अग्नि को बनाया, हनुमान्‌जी उन्हीं के दूत हैं। इसी कारण वे अग्नि से नहीं जले।

रामायण की कथा तो हम सब बचपन से सुनते आ रहे हैं किस तरह भगवान राम ने लंका पर आक्रमण कर सीता मईया को रावण की कैद से मुक्त किया था।

इस कथा में हनुमान जी के लंका दहन का प्रसंग बेहद रोचक है.. जब रावण ने हनुमान जी के पूंछ में आग लगाने का आदेश दिया और हनुमान जी ने उसी आग से पूरी लंका जला डाला… लेकिन क्या आपको पता है लंका तो जली थी पर रावण के भाई विभीषण का भवन नही जला था और इसके पीछे की वजह और भी रोचक है जो कि आज हम आपको बताने जा रहे हैं।

जब हनुमान जी के पूंछ में आग लगी तो उछल कूद मचाने लगे और पूरे महल को अपनी पूंछ की आग से जलाने लगे ..लेकिन इसी दौरान जब वो विभीषण के भवन पहुंचे तो उन्हे कुछ ऐसा दिखा कि उन्होंने विभीषण के भवन में आग नही लगाई।

दरअसल विभीषण के भवन के द्वार पर तुलसी का पौधा लगा था.. साथ ही भगवान विष्णु का पावन चिह्न शंख, चक्र और गदा भी बना हुआ था। सबसे सुखद तो यह कि उनके घर के ऊपर ‘राम’ नाम अंकित था यह देखकर हनुमानजी ने उनके भवन को नहीं जलाया।

ये तो सर्वविदित है कि विभीषण रावण का भाई जरूर था पर उसकी प्रवृति रावण से बिल्कुल अलग थी। विभीषण बेहद धार्मिक प्रवृति का था ..यहां तक कि रावण की संगत में रहने के बावजूद वो राम भक्त था और उसकी इसी भक्ति का परिचय देख हनुमान जी उसका घर नही जलाया था।

विभीषण ने ही की थी सबसे पहले हनुमान जी की स्तुति!!!!!!

हनुमानजी की प्रार्थना में तुलसीदासजी ने हनुमान चालीसा, बजरंग बाण, हनुमान बहुक आदि अनेक स्तोत्र लिखे, लेकिन हनुमानजी की पहली स्तुति किसने की थी? तुलसीदासजी के पहले भी कई संतों और साधुओं ने हनुमानजी की श्रद्धा में स्तुति लिखी है। असल में इंद्रा‍दि देवताओं के बाद धरती पर सर्वप्रथम विभीषण ने ही हनुमानजी की शरण लेकर उनकी स्तुति की थी।

ये प्रसंग रावण के वध के बाद का है जब विभीषण के दण्ड की बारी आई तो विभीषण के शरण याचना करने पर सुग्रीव ने श्रीराम से उसे शत्रु का भाई व दुष्ट बताकर उनके प्रति आशंका प्रकट की और उसे पकड़कर दंड देने का सुझाव दिया। पर हनुमान जी ने उन्हें दुष्ट की बजाय शिष्ट बताकर शरणागति देने की बात की। इस पर श्रीरामजी ने विभीषण को शरणागति न देने के सुग्रीव के प्रस्ताव को अनुचित बताया और हनुमानजी से कहा कि आपका विभीषण को शरण देना तो ठीक है किंतु उसे शिष्ट समझना ठीक नहीं है।

इस पर श्री हनुमानजी ने कहा कि आप लोग विभीषण को ही देखकर अपना विचार प्रकट कर रहे हो मेरी ओर से भी तो देखो, मैं क्यों और क्या चाहता हूं…। फिर कुछ देर हनुमानजी ने रुककर कहा- जो एक बार विनीत भाव से मेरी शरण की याचना करता है और कहता है- ‘मैं तेरा हूं, उसे मैं अभयदान प्रदान कर देता हूं। यह मेरा व्रत है इसलिए विभीषण को अवश्य शरण दी जानी चाहिए।’

विभीषण ने हनुमानजी की स्तुति में एक बहुत ही अद्भुत और अचूक स्तोत्र की रचना की है। विभीषण द्वारा रचित इस स्तोत्र को ‘हनुमान वडवानल स्तोत्र कहते हैं।

सब सुख लहे तुम्हारी सरना।
तुम रक्षक काहू को डरना।।

हनुमानजी ने अपने जीवन में कई राक्षसों और साधु-संतों को भयमुक्त और जीवनमुक्त किया है। हनुमानजी ने सबसे पहले सुग्रीव को बाली से बचाया और सुग्रीव को श्रीराम से मिलाया। फिर उन्होंने विभीषण को रावण से बचाया और उनको राम से मिलाया। हनुमानजी की कृपा से ही दोनों को ही भयमुक्त जीवन और राजपद मिला

 

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